लड़प्पन के दिन आयेगें नही

*कविता*लड़प्पन के दिन आयेगें नही

पुराने दिन आयेगें नही
लड़प्पन के दिन जायेगें नही

खेलते थे,छुप्पन-छुपाई
लेते थे,दिन की लुटाई
सीखते थे,माँ अच्छाई
देखते थे,जिंदगी की बुराई

रखते थे,खेतों की खुदाई
करते थे,खेतों में बुनाई
करते थे,खेलों में कुदाँई
रखते थे,जिंदगी की भलाई

खेलकूद में प्यार था,हमारा
बड़प्पन का गाँव था,हमारा
नदियों के साथ संगम था,हमारा
लहरों के साथ संगीत था,हमारा

धान के खेतों लहर जाते थे
बड़प्पन में वहाँ?खो जाते थे
खेलकूद में हम लड़ जाते थे
गाँव की यादों में ठहर जाते थे

हर वृक्षों की छाया मुझे याद है
हर यादों में मेरी ही जान है
गाँव की बातों में मेरी ही शान है
वर्षों पुरानी मेरी ही बात है

वे दिन अब नही मिलते है
ढूँढने पर वह लोग नही दिखते है
ज़िंदगी में यह पल नही भूलते है
बिखर गये दिन अब नही मिलते है

बात बहुत पुरानी थी
जिंदगी की रानी थी
आयी वह लड़प्पन थी
गयी वह बड़प्पन थी
सताने वाली जग रानी थी

रचयिता:रामअवध









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