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आफ़त नही नियम चाहिये

*कविता*आफ़त नही नियम चाहिये

नियम तोड़कर इंसान दौड़ता है
नियम जोड़कर कुदरत उगता है
वनों की शृंगार को मिटा देते है
कुदरत की माया को हटा देते है

नियम से इंसान चले
नियम से संसार चले

आफ़त है,मुझे इस जहान के लोगों से
नफ़रत है,मुझे कुदरत को मिटाने वालों से
प्यार है मुझे,कुदरत को जानने वालों से
चाहत है मुझे,बीहड़ को बचाने वालों से

आसमानों से कोई आवाज़ आती है
कुदरत की रोने पर कोई आगाज़ आती है
इस जहान में कोई आघात पहुँचाती है
बीहड़ को हटाने के लिए कोई जाल बिछाती है

लहरता गगन की माया में देखो
महकता आँगन की छाया में देखो
ज़िंदगी में प्यार की अभिलाषा देखो
बरसते बादल में मिट्टी की ख़ुशबू देखो

कुदरत की नियम से चलते है
हर पल अच्छे से ढलते है
ना कुदरत की माया से डरते है
उसकी महक अपने दिल में रखते है

ना ही हम कुदरत से लड़ते
ना नही हम जीवन को नष्ट करते
ऊँची दीवार पर हम चढ़ते
कुदरत को हम ही पुकारते

रचयिता:रामअवध









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