ढूँढता हूँ

*कविता* ढूँढ़ता हूँ

वे दिन कहाँ गये
मैं आज ढूँढता हूँ
वे वक्त कहाँ गये
मैं आज खोजता हूँ

ढूँढता हूँ गलियों में
देखता हूँ अपनी यादों में
जुड़ता हूँ अपनी चाहत में
देखता हूँ अपनी ख्यालों में

उस पल में तृष्णा नही थी
उस पल में घृणा नही थी

हँस कर पल गुजार देते थे
जिंदगी का वही पल ढाल देते थे
आज लौटने का मन करता है
पल में जाने का ख्याल आता है

उस वक्त का ज़माना,कब ढल गया
ज़माने के साथ पल कब हट गया
जिंदगी के साथ कब छोड़ गया
मानव के भीतर दानव कब आ गया

सब कुछ बदल गया है
वे ज़माना अब ढल गया है
ज़िंदगी से अब हार गया है
समय की मार से अब मर गया है

रचयिता:रामअवध


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