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संध्या

*कविता*संध्या

सुरज ढलता है,दिन छिपता है
संध्या होती है,तारे चमकतें है
चाँद खिलता है,बादल घिरता है
आँखों पर पलकें है,नींदो की बरसात है

नभ में दिखते है,पंक्षियों के कतार
सुरज ढलने से पहले होते तैयार
जिस दिशा की ओर मुख करें
उसी दिशा की ओर आवास है

रातों में जुगनू का प्रकाश
खेतों में अजीब सी आहट
ये अंधरियाँ रात में
नींदो की बरसात में

बचपन में भी देखा
ऐसा ही अंधरियाँ रात
रातों डरा-करता था
बिस्तर पर सोया करता था

चाँद भी बादलों में छिप रहा है
लोग भी आपने घरों में सो रहे है
मुझे तो रात प्यारी है
बीते पलों की याद प्यारी है

सोच रहा हूँ
बड़ा होने पर पल बदल जाते है
बचपन की पल ,दोहरा रहा हूँ

रचयिता:रामअवध



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