कहाँ ज़िंदगी बीताऊँ

*कविता* कहाँ ज़िंदगी बीताऊँ

कहते है लोग मोड़ कर चला जाता हूँ
ज़िंदगी के आगे से झुक चला आता हूँ

एक परछाई ही तो है
जो मेरे साथ चलती है
एक अच्छाई ही तो है
जो मेरे से बातें करती है

झुनझुनाहट सी हवा सुना कर जाती है
अपने साथ जन्मभूमि सुवास लाती है
ठहरे हुए पलों की सदाबहार लाती है
खुशियों की उठती महक उठाती है

मैं चूमता हूँ इन हवों को
मैं ढूँढता हूँ इन वनों को
मैं घूमता हूँ इन रवों को
मैं झूमता हूँ इन लवों को

ये पल ही तो है चलता चला जाता है
बीते पल ही तो है यादें बनता चला आता है
ये परछाई ही तो है जो साथ हमेशा रहता है
ये ज़िंदगी ही तो है जो रात हमेशा रहता है

कुछ पल लम्हे साथ जी लेता हूँ
यादें उसी के साथ छोड़ देता हूँ
हर पल उसी लम्हे साथ खेल लेता हूँ
ज़िंदगी के कुछ पल उसी के साथ बीता लेता हूँ

रचयिता:रामअवध

0 Comments