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माटी मेरी जान है

*कविता*माटी मेरी जान है

जान सबका बचा देती है
ऐसा अनाज उगा देती है
लोगों का मन लगा देती है
भवन सबका बसा देती है

चीर कर छाती नीर बहा देती है
ख़ुशबू बन कर भू को लहरा देती है

माटी ही सबका जान बसाती है
चीर कर सीना अनाज उगाती है
खेतों की हरियाली नभ को दिखाती  है
माटी अपना सुख नर को दिखाती है

बिना कहे सब कुछ उगा जाती है
भूख-प्यास सबका मिटा जाती है
लोगों की चाहत दिखा जाती है
माटी में सबका जान दिखा जाती है

माटी थाम रखी है,इस जहान को
जान बचा रखी है,सभी की जान को
बसा रखी है,सभी की पहचान को
जान रखी है सभी की चाहत को
समझ जाती है, सभी की अरमान को

माटी में कही गुणों का वास है
जो जाने उसी की साँस बसा है

माटी कहे,या संसार कहे
खेत कहे,या जान कहे
जीवन कहे,या प्यार कहे
ज़िंदगी कहे,या रात कहे

रचयिता:रामअवध





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