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ख़ौफ़ की रथ
कुदरत ही ज़िंदगी है
दरिद्र
अँधेरे की डोर
ठहर भी जायेगें
क्या करुँ?
दूर खड़े
कोरोना आफ़त
मन का चक्र
कुदरत की डगर
दुआओ में माँ
झाँकना है
हिंसा का दर्पण
उलझ-सुलझ
रखता हूँ
वक्त भी सीखाती है
वक्त की माया
मन की ठेला
मृत्यु हूँ,मैं
कहानी बुलाती है
कहाँ है डगरिया
युद्ध के क्षण में
ठोकरें की डगर
वक्त का रण
नफ़रत की द्वार