उलझ-सुलझ

*कविता*उलझ-सुलझ

ख़ामोशी की लहर मेरी नयनों पर
ज़िंदगी की कहर मेरी ख़ौफ पर
बीहड़ की सुन्दरता मुझे बुलाती है
वही सुन्दरता से ही मुझे महकाती है

प्रणय की ज़िंदगी बनाती है
वनों की छाया में वह आती है
ज़िंदगी मेरी उड़ा ले जाती है
चाहत मेरी दिखा कर जाती है

विटप से महकता ये गुलशन है
विकट से निकला ये उलझन है
निकट में रहता है ये सुलझन है
नाटक से बनता है ये कहानी है

ये जहान उलझन सी माया है
ज़िंदगी की बनती हुई छाया है
कहाँ से बनकर आती ये जहान?
जिंदगी में आकर जाती ये जान

अंहकार से हारी ये संसार
अंधकार से आयी ये संहार
सुधारने की चाहत रखता हूँ मैं
जीवन की अतीत में बसता हूँ मैं

रचयिता:रामअवध



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