हिंसा का दर्पण

*कविता*हिंसा का दर्पण


शोणित की धारा भर आयी है
दानव की छाया चढ़कर आयी है
वक्त में भी विनाश नज़र आती है
ज़िंदगी भी शैतान नज़र आती है

मानव भी दानव बन जाते है
हिंसा का दर्पण दिखा जाते है
वसुधा की धारा अब भर चुकी है
अंतिम क्षणों की पुकार आ चुकी है

ज़िंदगी की माया में खो चुका हूँ
ज़िंदगी की छाया में रो चुका हूँ
जीवन के साथ ये साँसे रहती है
ह्रदय की छाया ओर कही मरती है

मेरी ज़िंदगी मेरे पास नही है
किसी हवाले मेरी आस नही है
सपनों की चाहत अब खत्म हुई
ज़िंदगी की राहत अब ज़ख़्म हुई

साँसों को लेकर चलता हूँ
वक्त के सामने मे मरता हूँ
ज़िंदगी के आगे ढलता हूँ
कुदरत की ओर चलता हूँ

रचयिता:रामअवध

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