झाँकना है

*कविता*झाँकना है

झाँकता हूँ,खिड़की से
पहचानता हूँ,जिंदगी से
कही तो ये ज़िंदगी चली जाती है
यादों बिना सब ढलकर रह जाती है

पल कही भी ढल जाती है
डर कही भी रह जाती है
ज़िंदगी कही भी बस जाती है
खुशियों की डगर में रह जाती है

यादें बस याद रह जाती है
जिंदगी के सम्मान रह जाती है
यादें भी कुछ कहकर जाती है
यादों में ही रहकर जाती है

ठहर जायेगें,हम भी किसी यादों पर
कहर जायेगें,हम भी किसी बातों पर
ख्वाहिश की चाहत से डरता हूँ
ज़िंदगी की बातें से आज मरता हूँ

बसने दो इन यादों को
ठहरने दो इन पलों को
कहरने दो इन रातों को
कहने दो इन आँखों को

रचयिता:रामअवध



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