कुदरत की डगर

*कविता*कुदरत की डगर

तिमिर की छाया में खो रहा हूँ
शिशिर की चादर में सो रहा हूँ
मौसम के साथ संगम है मेरा
कुदरत के साथ रिश्ता है मेरा

पलभर की याद आने दो
कुदरत के साथ जाने दो
कही तो यादों का नूर होगा
कही तो कुदरत का सूर होगा

कुदरत की लालिमा में मुझे खोना है
कुटिया की महिमा में मुझे सोना है
सरोवर के छोर पर मुझे बैठना है
नौका की बहाव में मुझे घूमना है

अँधरिया रात भी कुछ दिखाती है
आसमान की तारा हमें दिखाती है
चाँदनी बातों का अहसास दिखाती है
अहसासों में ही राज़ मुझे दिखाती है

कुदरत का भी अपनी ज़िंदगी है
कुदरत की साँस चलती रहती है
साँसों के साथ अहसास भरती है
युगों-युगों के साथ चलती रहती है

रचयिता:रामअवध




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