future

मन का चक्र


*कविता*मन का चक्र

मन मार कर रहना पड़ेगा
ज़िंदगी भी हमें जीना पड़ेगा
मजबूरियाँ भी हमे लेना पड़ेगा
चाहत का मन हमें खोना पड़ेगा

लाचार होकर भी चलना पड़ेगा
कदम की रेखा हमें बनाना पड़ेगा
ख़ौफ़ की पथ भी अब साथ नही छोड़ती है
ज़िंदगी का वक्त भी अब हाथ नही तोड़ती है

ज़िंदगी भी अब जीकर दिखायेगें
खुद का ही सहारा बनकर दिखायेगें
ज़िंदगी से भी दूरियाँ बनायेगें
खुद का ख़्वाब में ही जी जायेगें

समय के चक्र फँस रहा हूँ
ना जाने कहाँ अटक रहा हूँ?
ज़िंदगी में कहाँ भटक  रहा हूँ?
चलते कदम में मटक रहा हूँ

निराशा मुझे अब घेरा है
उल्लासा मुझे अब चेरा है
ज़िंदगी अब मेरा डेरा है
ज़िंदगी ने मुझे अब पेरा है

ज़िंदगी का बदलना भी ठीक है
लोगों के साथ ढलना भी ठीक है
अधूरा पल अधूरा ही रह गया
वक्त का पल अब वक्त में ढल गया

रचयिता:रामअवध

Post a Comment

0 Comments