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कोरोना आफ़त

*कविता*कोरोना आफ़त

मर जायेगें
घर जायेगें
घर की ओर चल जायेगें
पीड़ा लेकर हम चल जायेगें
बढ़ते कदम रोकेगें नही
ऋतु का बदलाव देखेगें नही

कौर नही है मेरे मुख में
भूख नही है मेरे सुख में
ख़ौफ़ नही है मेरे सफ़र में
लौभ नही है मेरे नज़र में

ये कदम भी थकती नही
रक्तहीन होकर झुकती नही
कौर के लिए पेट तड़पती है
तड़पते हुए ये दिल बरसती है

मेरी नयनों गाँव की ओर देखती है
चलते डगर की ओर हमें छोड़ती है
घर की ओर जाने के दिल मेरा बेताव हुआ
रहकर-सहकर मेरा दिल अब तनाव हुआ

तड़पकर हम रख गये थे
संकट के वक्त हम फँस गये थे
पीड़ा होती है मेरे सीने में
भीड़ा होती है मेरे जीने में

रचयिता:रामअवध


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