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वक्त का रण

*कविता*वक्त का रण

कभी लगता है,मैं चल नही पाऊँगा
चलते कदम से कही गिर ना जाऊँगा
ये वक्त ही तो है जो मेरे साथ रहता है
बुरे हो या अच्छे मेरे साथ ही ढलता है

शरण लेता हूँ इस पल में
मरण लेता हूँ इस क्षण में
कदम छोटे कण दिखते है
ना देखो तो रण लिखते है
मन की शरण मर जाती है
तन की मरण रह जाती है

पाँव नंगे है कदम की डगर पर
जिंदगी भी खड़ी किसी नगर पर
सही वक्त का बसेरा देखना है मुझे
यही पल का सवेरा देखना है मुझे

ये हवा ही तो है जो सुकून भर चली जाती है
ज़िंदगी की बरसते कदम पर हमें जोड़ जाती है
ख़ामोश ही रहना है,ज़िंदगी ही दर्पण देखना है
लोग बहुत कुछ कहते है उन्हें कुछ कह कर जाना है

दूर ही रहना चाहता हूँ,कही ओर बसना चाहता हूँ
पल की शरण  जाना चाहता हूँ,वही ठहर जाता हूँ
हमारा भी दिन आयेगा,चमकता हुआ ये वक्त लहरायेगा
ज़िंदगी के साथ ये पल आयेगा,ऐसा भी दिल आयेगा

रचयिता:रामअवध





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