क्या करुँ?

*कविता*क्या करुँ?

एक ही सफ़र था मेरा
जिस पर नज़र था मेरा
राहों में ठोकर भी लगा
खुद को संभारने लगा

देख रहा था,चारों दिशाओं मिलना कोई व्यक्ति
पुकार रहा था,ज़िंदगी की आवाज दिखा कोई शक्ति
कही जा रहा था,विधाता से मेरी आखिरी विनती थी
डगर वाली रात था,मेरी ज़िंदगी की आखिरी पुकार थी

घनों बादलों का अँधेरा आया है
डरावनी वाली मुलाक़ात लाया है
उजाले की तलाश में हमें हटाया है
तलाश में ज़िंदगी की हार बताया है

क्या? करुँ मेरा वक्त तो हार गया
क्या? करुँ मेरा रक्त तो बह गया
दूर-दूर तक मैदानों का डगेरा था
कोई ना दिखा ऐसा तो नगेरा था

साहस भी अब साथ छोड़ रही थी
ज़िंदगी भी अब हाथ धो रही थी
कुदरत की माया मुझे जकड़ रखा था
ना जाने कहाँ मुझे पकड़ रखा था

रचयिता:रामअवध

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