ठहर भी जायेगें

*कविता*ठहर भी जायेगें

ठहर जायेगें हम कही
संभल जायेगें हम कही
वक्त की ढाल में हम जीयेगें
संसार का रस में हम पीयेगें

ये जिंदगी तो चला ही जायेगें
संसार से दूर कही बस ही जायेगें
यादों की छाप कही छोड़ ही जायेगें
वक्त के काल में कही रो ही जायेगें

जिंदगी भी एक माया है
जिंदगी की हम छाया है
कब-तक सोच में रहेगें
कभी तो यादों में बसेगें

सब बिखर गये
हम निखर गये
सबका वक्त दूर है
जाने पर सबका नूर है

कही का दूर अपनी भी बात है
यही का नूर अपनी भी रात है
वक्त को संभालने में निकला हूँ
जिंदगी को जीने में निकला हूँ

रचयिता:रामअवध

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