अँधेरे की डोर


*कविता*अँधेरे की डोर

कब?-तक अँधेरे को झाँकता रहूँगा
कभी तो उजाले की तलाश करूँगा
अँधेरे की छाप को छोड़ देगें
उजाले की ताप को पकड़ लेगें

हम यूँ ही राहों में चलते रहेगें
राहों के पन्ने यूँ ही पलटे रहेगें
कदम की चाल कभी ना रोकेगें
डगर में रात कभी ना देखेगें

ये राहों की डोर अकेली चलती है
अकेली डगर में ये कभी टूटती है
टूटते हुए ये धरती पर गिर जाती है
हौसले को कभी ना छोड़ पाती है
ज़िंदगी की डगर यूँ ही गिर जाती है

ज़िंदगी की प्यास कब?बुझायेगा
उजाले की उल्लास कब?दिखायेगा
अँधेरे की ज़िंदगी कब? हटायेगा
उजाले की तलाश कब? करवायेगा

हम बैठे उजाले की तलाश में
कब?आ गये अँधेरे की प्रकाश में
जाने कहाँ? खो गये उल्लास में
जिंदगी में कहाँ? गिर गये साँस में

रचयिता:रामअवध



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