दरिद्र

*कविता*दरिद्र

सफ़र की गोद में हम भी चलते है
माँ की आँचल में हम भी पलते है
हम उम्मीद की किरण साथ रखते है
सफ़र के सौहाने पलों का रथ रखते है

वेदना को साथ लेकर चलते है
पसीने का रक्त हम भी बहाते है
खुद का साहस हम भी रखते है
मजबूरियों में हम भी घिर जाते है

ज़िंदगी का साँस हम ना छोड़ पाते है
मजबूरियाँ साथ लेकर हम चल जाते है
विपत्ति का साँस लेकर भी हम बस जाते है
साँसों में मजबूरियाँ भी लेकर चल जाते है

वस्त्र की परख ना कर पाते है
दर्पण में दर्शन ना देख पाते है
जो मिल जाता है वही सही है
जो ना मिलता है वह भी सही है

कभी ना कभी ये रेखा भी तोड़ देगें
समय के पन्ने में यह भी लिख देगें
आगे भाग्य की लकीर भी मोड़ देगें
पसीने के कण हम इतिहास बना देगें

रचयिता:रामअवध

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