कुदरत ही ज़िंदगी है

*कुदरत ही ज़िंदगी है रही है


ज़िंदगी मजबूरियों से बंधी पड़ी है
कहाँ?जीने की साँसे खोई पड़ी है
जीने की साँसे अब अटक रहा है
ज़िंदगी की यादें भी भटक रहा है

ज़िंदगी की बातें अब आने लगी
ज़िंदगी की रातें अब जाने लगी
वक्त की मुलाक़ात भी खुब लगी
भूलों अतीत को दोहराने लगा
खुब बीते यादें अब लहराने लगा

हवाओं का रंग अब बदल गया
ज़िंदगी की डगर अब ढल गया
यादों में ये पल कही तो खो गया
ज़िंदगी की रण में कही तो रो गया

मैं आज भी दूर रह जाता हूँ
खाली पल में कही बस जाता हूँ
वक्त की साँस में कही जी जाता हूँ
वही की यादों कही बस जाता हूँ

रचयिता:रामअवध





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