ख़ौफ़ की रथ

*कविता*ख़ौफ़ की रथ

ख़ौफ़ की रथ लहराती है मुझमे
जीने के पथ डहराती है मुझमे
यादों की बात ठहराती है मुझमे
जीवन की रात बरसाती है मुझमे

वक्त के पन्ने यूँ ही चलते-रहते है
जीवन कथा यूँ ही ढलते-बढ़ते है
मैं खुद ज़िंदगी की तलाश करता हूँ
खुद की राह में उल्लास भरता हूँ

ये हवाओं के साथ पन्ना पलटा-रहता है
ज़िंदगी की कहानी यूँ ही चलता-रहता है
तरंगों में ज़िंदगी की कतार देखता हूँ
लहरों के साथ ये इन्तज़ार देखता हूँ

सब कुछ बह गया,ज़िंदगी के सागर में
यादों में बस गया,ज़िंदगी के बहार में
हम भी कही ठहर गये,वक्त के नगर में
अतीत को मोड़ गये,जीने के शहर में

वक्त ये सूना है ये राह नही
उक्त को पाना है ये दाह नही
यादों के ज़िंदगी अब ले चुका हूँ
ज़िंदगी के पास अब छोड़ चुका हूँ

रचयिता:रामअवध

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