बन्ध कर नही

*कविता*बन्ध कर नही

बन्ध कर नही
सहल कर का जीना चाहता हूँ
खुद के पन्ने में
अपनी जिंदगी लिखना चाहता हूँ

वक्त तो बदल ही जायेगा
ज़िंदगी के साथ ढल ही जायेगा
कब?तक रक्त दौड़ेगा मेरे तन में
कभी तो ठहरेगा ये वक्त मेरे मन में

यही यादों के सहारे ही तो बसता हूँ
ज़िंदगी के पल में आकर ग्रसता हूँ
वक्त के आँखों में आकर ढलता हूँ
ज़िंदगी के पन्ने वही तो फहराता हूँ

जीने की सोच में यूँ ही ढल जाता हूँ
जग की माया में यूँ ही मर जाता हूँ
ख़ौफ़ के पल में यूँ ही क़हर जाता हूँ
बहार की तलाश यूँ ही लहर जाता हूँ

आयेगे,ज़िंदगी के पीछे हम भी
चलगे,चेतन के बस में हम भी
रस के सागर में डूबना चाहता हूँ
खुशियों के बहार में झूमना चाहता हूँ

रचयिता:रामअवध

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