अवन जले

*कविता*अवन जले

समा जले या अवन जले
ज़िंदगी में ये श्रावन जले
धूप में ये बादल जलने लगेंगा
तब जाकर श्रावन बरसने लगेंगा

तप कर भी तप जायेंगे
लू में लपट कर रह जायेंगे
अग्नि राख साथ में लेकर चलेगें
तपते लू को बहार मान कर बसेगें

ये नरों की समीर बाँधती है मुझे
ये जगत की डहर डहराती है मुझे
समा की डगर में यूँ ही बातें करुँगा
अवन की नगर में यें ही रातें काटूँगा

वक्त की डगर में टकरायेगें हम
जीने की नगर में बस जायेगें हम
मक्खन की तरह पिघल नही सकते
वक्त हम ना कुछ करे,हम रह नही सकते

जिंदगी की कदम कही ओर चली जाती है
चाहत को मार कर कही ओर रह जाती है
ये चेतन की शान है जो कभी मानता ही नही है
ये राहों के वक्त है जो कभी ढलता ही नही है

रचयिता:रामअवध

0 Comments