कुदरत की रोष

*कविता*कुदरत की रोष

सागर की लहर काँपने लगी
तटिनी पर कहर बाँटने लगी
कुदरत की रोष जागने लगी
नभ पर बिजली चमकने लगी

राखों की ज़मीन उड़ाने लगी
श्रावन में ज्वाला बरसाने लगी
बीहड़ की काया झुकाने लगी
भू पर उनका अंग उड़ाने लगी

वर्षा की कहर अब आने लगी
ढेला की लहर अब बरसाने लगी
खेतिहर को कुदरत अब सताने लगी
मेहनत की ज़ायद अब हटाने लगी

नयनों की धारा अब बहने लगी
फ़सलो की खेत अब उजड़ने लगी
कुदरत की रोष अब बरसने लगी
नभ पर तिमिर की छाया बढ़ने लगी

वक्त मेरा अब ठहरने लगी
साँस मेरा अब अटकने लगी
साहस मेरा अब टूटने लगी
निराशा मेरा अब बढ़ने लगी

रचयिता:रामअवध

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