कदम कही ओर

*कविता*कदम कही ओर

कदम की राह मुँह मोड़ लेती है
जीने की डगर हमें छोड़ देती है
समा के साथ हमें रोक लेती है
बीते क्षण के साथ हमें घोल देती है

जीने की डोर हमें बाँधती है
कुदरत के वक्त हमें खेलाती है
जगत की रस हमें दिखाती है
जीने की साँस हमें दे जाती है

कही तो कदम ठहर ही जायेगा
समा के क्षण में बह ही जायेगा
पल भर की यादों में कैसे? रोकूँगा
यादों के क्षण भर में कैसे? बैठूँगा

धीरे-धीरे कदम रुकता ही जा रहा है
पाँव के नीचे भू हटता ही जा रहा है
गगन की लहर में कदम बढ़ता हूँ
पवन की नज़र में शाम दिखाता हूँ

घनों की छाया मेरी शान बसती है
वनों की माया मेरी जान बसती है
लहराती हूँ हवा मुझसे कुछ कहती है
ज़िंदगी जीने की डगर हमें बता जाती है

रचयिता:रामअवध


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