future

मन की ठेला

*कविता*मन की ठेला

मन मुझे कुछ कहती है
दूर रहने को सहती है
बड़ा ही बेचैन रहती है
वही की यादों में खोयी रहती है

ये मन ही तो है जो मुझे भटकाती है
जहाँ? मन वहाँ लेकर चली जाती है
बेचैनी की राह मुझे यही बताती है
कही दूर चलो,हर बार कह चली जाती है

पल की राह में मुझे कहाँ? लेकर चली जाती है
वही की यादों में छोड़ कर कहाँ? चली जाती है
ये मन ही तो जो ज़िंदगी की डगर में साथ देती है
ज़िंदगी की खामोशियों हमें यही तो बताती है

कहने को बहुत कुछ कहती है
मेरा तन हिला कर चली जाती है
ये मन ही तो है जो मुझे कह जाती है
हमेशा मुझे अपनी राह दिखा जाती है

यही तो है जो मुझसे प्रीत लगा रहती है
कहने को बहुत कुछ कहती है
हमारी ज़िंदगी में ही रहती है
हमेशा मुझे यही तो भटकाती है

आज भी मुझसे रूठ जाती है
ज़िंदगी में मेरे साथ टूट जाती है
खुशियों की लहर भी देती जाती है
इस जग से दूर कही लेकर जाती है

रचयिता:रामअवध

Post a Comment

0 Comments