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युद्ध के क्षण में

*कविता*युद्ध के क्षण में

रण का दिन आया है
रक्त का दिल बहाया है
दूर खड़ी शैतानी थी
मन बड़ी हैरानी थी

अस्त्र-शस्त्र की त्वचा देखा
मानव से भरी थी ये भूमंडल
अहंकार में दोनों का विपक्ष देख
षड्यंत्रों से भरी थी रण की नकल

रणभूमि में रक्त का बहाव देखा
घृणा भरे ये इंसान का बनाव देखा
प्रतिशोध की भावना ये नर देखा होगा
प्रतिरोध की डालना ये नर चुका होगा

ये नर अब दानव बने
हिंसा के पीछे दावना बने
घृणा के पीछे हिंसा देखा होगा
मानव के पीछे दानव देखा होगा

कहते है लोग मुक्ति की ओर चलो
चलते है लोग भुक्ति की ओर चलो
रणभूमि में कुछ नही मिलता है
सब खत्म होने पर सब दिखता है

रचयिता:रामअवध

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