ठोकरें की डगर

*कविता*ठोकरें की डगर

कदर हो,मेरी राह की
कथन हो,मेरी चाह की

ठोकरें भी कुछ बताती है
चलते इंसान को गिराती है
कदम को कुछ सीखाती है
राहों का रंग हमें बताती है

क्षमता की रेखा दर्शाती है
डगर की पीड़ा बताती है
ठोकर भी ख़ामोश रहती है
बिना कहे सब कुछ कहती है

समझ लो ख़ामोशी की परिभाषा
देख लो,जिंदगी ठोकर की आशा
कदम में ठोकर लगना ठीक लगता है
स्वयं का अहंकार का बता चल जाता है

लोग चलते मंजिमा देखने के लिए
हम चल देते है राह बताने के लिए
ठोकर हमारी साहस देखती है
सह लो तो इतिहास लिखती है

ठोकर अहंकार दिखाती है
मिल जाओ तो ऐसी बात बताती है
कहने को राज़ दिखाती है
जिंदगी जीने बात बताती है

रचयिता:रामअवध



0 Comments