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कहाँ है डगरिया

 *कविता*कहाँ है डगरिया

बादलों की छाया,पीछा नही छोड़ती है
धूप से बचने के लिए नीचे नही देखती है
कहाँ किस्मत का नजारा टूटता हैं?
नजारे में ये भाग्य कहाँ मिलता हैं?

कहते है लोग मुझे विश्वास करो
छोड़ कर जाते है लोग मुझे इंतजार करो
हर बार फंस जाता हूँ,यादों की नजरिया में
ढूँढने निकलता हूँ,किस्मत डगरिया में

हाथ से कलम भी छूट जाता हैं
लिखने पर कही शब्द टूट जाता है
वक्त भी अब अजान लगता है
दिल भी कही बेजान लगता हैं

ज़िंदगी के शब्द कम लगते है
ज़िंदगी के अर्थ कम दिखते है
अब ज़िंदगी के पल कम रह गये
बड़प्पन के दिन कब बीत गये?

वक्त बहुत कम है,मेरी यादों पर
जिंदगी ढल गयी है मेरी यारों पर
ज़िंदगी का पल किसने बनाया होगा?
जिंदगी के चलते कदम कब चला होगा?

रचयिता:रामअवध

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