गौरैया का सवेरा

*कविता*गौरैया का सवेरा

डूलती हुई डाली में लहराती है
उड़कर पंख नभ में फैलाती है
पवन की डगर में उड़ जाती है
संसार में घूमकर आ जाती है

चुन-चुनकर खेतों की दाना
घर की ओर मुड़ जाती है
देखो,मेहनत का लाना है
पंरिदों की उड़ान कह जाती है

गगन की शृंगार ये कहलाती है
डगर की गगन ये महकाती है
बीहड़ में ये आहट दे जाती है
मानव का सवेरा बता जाती है

श्रावन भी बरस कर आयेगी
पंरिदों की पुकार सुन जायेगी
वनों की प्यास बूझा कर जायेगी
नभ की छाया बना कर जायेगी

पंक्षियों की गुनगुनाहट लायेगी
सवेरे में पंक्षियों की चाहत लायेगी
श्रावन में फूलो की बहार सजायेगी
बीहड़ की छाँव में ये राहत आयेगी

रचयिता:रामअवध











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