रहते-सहते

*कविता*रहते-सहते

कहते-कहते हम ढल जायेंगे
बसते-बसते हम बस जायेंगे
बसेरा ही सवेरा दे जाती है
ज़िंदगी का शोभा बना जाती है

दूबों पर ओस दिख जाती है
किरण उस पर जम जाती है
चमक उस पर खिल जाती है
पवन उसको उड़ा ले जाती है

खेतों में बनकर आ जाती है
शोभा की झलक दिखा जाती है
ज़िंदगी की राहत दे जाती है
मनुष्य की चाहत बन जाती है

सवेरा होते ही कदम चल पड़ते है
राहों की बस्ती में क्यों?बस जाते है
चलते कदम में हम क्यों?रुक जाते है
सवेरे के पल में हम यूँ ही खो जाते है

दूर तक उजाले की तलाश करता  हूँ
वक्त की राह में तेरा इन्तजार करता हूँ
अँधेरे की ज़िंदगी यूँ ही ढल क्यों?जाती है
ज़िंदगी की मुलाक़ात में बदल क्यों?जाती है

रचयिता:रामअवध


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