संकट के फँदे

*कविता*संकट के फँदे

जाल के फँदे दूर-दूर तक है
जीने की यादें चूर-चूर तक है

विपत्ति की छाया मुझे हर बार सताती है
भीषण के मुलाक़ात मुझे हर बार बुलाती है
जाल के फँदे ज़िंदगी के लिए हर बार गुथती है
ज़िंदगी की डगर में मेरी साहस हर बार तोड़ती है

 संकट की दोस्ती मेरी मुलाकात समझ लेना
ज़िंदगी की राहों में उसकी अहसास देख लेना
ये किस्मत में लिखा है विपत्ति को लेकर चलना
शायद उम्मीदों को नही,खुद को तप कर चलना

हर बार नही,बार-बार जिन्दगी को सताती है
राहों का संकट हर बार जिंदगी में आ जाती है
मैं भी आदत बना लूँगा,ज़िंदगी में तुम्हे पाने की
मैं भी तपकर रह जाऊँगा,ज़िंदगी में तुम्हे जाने की

संकट की राहों में मुझे सवेरा ही तो जागाना है
ज़िंदगी के कदम में बसेरा को ही तो चलाना है
छिपे सूरज की किरणें भी उम्मीद जागा देती है
ज़िंदगी की डगर में जीने की राह बता देती है

विपत्ति में ये कदम भी डगमगाते है
साहस कितना,वे उस वक्त बताते है
संकट के वक्त कौन नही डगमगाते है?
झेलनों की लहर वही तो लहराते है

रचयिता:रामअवध


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