फुटी है ज़िंदगी

*कविता*फुटी है ज़िंदगी

उठी है ज़िंदगी,फुट गयी नसीब
लगी थी प्यास,बुझ गयी इतिहास
खोने के डर से अब रोने लगा
क्या?बीते पल थे अब सोने लगा

कही के पल कही भी मिट जाती है
जीने की डगर कही भी टूट जाती है
साँसो का लेना कही भी रूठ जाती है
ज़िंदगी मेरी कही भी बिखर जाती है

दूर-दूर तक मेरी सोच निखर कर आती है
यादों की ज़िंदगी कही बिखर कर आती है
समय का पन्ना यूँ ही बदलता-रहता है
हर वक्त एक जैसा नही मिल पाता है

कही की यादे कही जाने लगी है
जीने का मेला अब सताने लगी है
मुलाक़ात मेरा अब घबराने लगी है
साहस के पन्ने मेरा मिटाने लगी है

देह भी अब साथ छोड़ती है
वक्त के पीछे हाथ मोड़ती है
कही तो मेरी जान तोड़ती है
कही तो मेरी शान जोड़ती है

रचयिता:रामअवध





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