मदहोशी की डगर

*कविता*मदहोशी की डगर

ज़िंदगी जीने की कोशिश करता हूँ
खूद में ही मदहोशी रहना चाहता हूँ
छिपते सूरज में मेरी ज़िंदगी झलकती है
पल की मदहोशी मेरी कही ओर दिखती है

कही तो ख़्वाहिश की रात देखनी है
रातों में जीने की अहसास बोलनी है
ज़िंदगी का आईना झलकती नही है
ख्वाबों के बिना कभी बरसती नही है

तुच्छे के दर्पण में,मेरी ज़िंदगी दिखती है
अतीत के पीछे मेरी जिन्दगी लिखती है
दूर खड़े,दृष्टि के पल मेरी दिन जोड़ती है
ख्वाबों की रात ही मेरी साहस जोड़ती है

शिशिर की चादर निचोड़ती है
जिन्दगी की सादर बोलती है
नींदो में ये ज़िंदगी ढोलती है
समय मेरा अब खोलती है

बेचैनी की राह डगमगाती है
जिन्दगी की बात सताती है
जीने की पथ अब तड़पाती है
ख़्वाब की रात्रि अब सताती है

रचयिता:रामअवध

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