घन-क्षण

*कविता*घन-क्षण

जमीन से उठा,गगन को तैराने चला
सूर्य की रश्मि से वक्त को जलाने चला
सागर का लहरता नीर,कह़र जायेगा
धीरे-धीरे कहरता घन,ठहर जायेगा

सूरज भी कुछ छिपाती है
बादल का रंग बदलती है
ढल जाने पर रंग दिखाती है
सवेरा बनकर हमें उठाती है

वक्त की यादें तुम्हारी बनकर आती है
जीने की सच बोल कर चली जाती है
कुदरत ही मेरी सब कुछ कह जाती है
जीवन मेरी उतार कर चली जाती है

वक्त की रेखा पड़ती है ज़िंदगी पर
सोच-समझकर बोलती है नर पर
कहने को कह जाती है नयनों पर
वक्त का वक्त बता देती औरों पर

देखो ज़िंदगी का जान महक जाता है
तभी तो जीने का ख़्याल बोल जाता है
 जिंदगी की किरण को तोड़ कर जाता है
वक्त आने पर ज़िंदगी को मोड़ कर आता है

रचयिता:रामअवध


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