जीने का पंख

*कविता*जीने का पंख

टहनी पर बैठी चिड़िया ठहराती है
पंख फैला कर मुझ पर मुस्कुराती है
डाल-डाल पर अपनी सवेरा जागाती है
वही की तनों में अपनी बसेरा बनाती है

दूर-दूर तक गगन में लहरती है
दाने के लिए भू पर ठहरती है
खेतों में आकर हिलोर जाती है
चोंच दबा गगन में लहरा जाती है

घने बादल का रंग हमें दिखाती है
आसमान की डगर हमें बताती है
आकाश में आवाज़ गुनगुनाती है
चिड़ियों की पंख फड़फड़ाती है

डगर की रात डगमागाती है
खग की बीहड़ महकाती है
जीने की डग हमें सीखाती है
ठहराती पथ हमें बताती है

कहती हुई ज़िंदगी हमें सताती
वक्त के चक्र हमें ही बताती है
पल की ढाल हमें ही तो सीखाती है
समय ढल जाने पर हमें तो बताती है

रचयिता:रामअवध

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