अटल-पटल

*कविता*अटल-पटल

सवेरा ही तो मुझे उठाती है
बसेरा ही तो मुझे बसाती है
समय ही तो मुझे रुलाती है
यादें ही तो मुझे जागाती है

अदल-बदल मौसम का रंग
अटल-पटल ज़िंदगी का ढंग
ना दिखे ये किस्मत का भंग
कह जाते है ज़िंदगी का चंग

धीरे-धीरे ज्योत जलती है
अँधेरे को वह भागाती है
जीने की किरण बनाती है
सफ़र मुझे ही दिखाती है

स्वभाव मेरा खराब नही है
हर वक्त मेरा जवाब नही है
जीने का मेरा अंदाज़ नही है
हर वक्त मेरा पहचान नही है

धीरे-धीरे ये साँसे टूट जायेगी
ज़िंदगी के आगे रूस जायेगी
शान की मुलाकात टूट जायेगी
जान मेरी ही कही बस जायेगी

रचयिता:रामअवध

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