छलाँग लगाई दी

*कविता*छलाँग लगाई दी

छलाँग लगाई दी कदमों में
जिंदगी देख ली कसमों में
भूमंडल पर पंरिदों का चलना
सवेरा बनकर ज़िंदगी से लड़ना

ज़िंदगी की उजाला आयेगी
डगर हमारी ही सजायेगी
बैठे है तिमिर की माया में
देख रहे सूर्य की छाया में

ज़िंदगी की सोच में ही डूबा है
भूमंडल की शोच में शुबा है
भूमंडल पर पंरिदों का चलना
सवेरा बनकर ज़िंदगी से लड़ना

ज़िंदगी की उजाला आयेगी
डगर हमारी   सजायेगी
हास बनती है ज़िंदगी मेरी
कुदरत में ढलती है वक्त मेरी

नीर की धारा यूँ ही बहती है
वक्त की रात यूँ ही ढलती है
संध्या की काल यूँ ही बढ़ती है
मेरा ख़्वाहिश यूँ ही बदलती है

रचयिता:रामअवध

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