दोष की कदम

*कविता*दोष की कदम

रोष की ज़िंदगी से हट गया हूँ
दोष की सादर में आ गया हूँ
बैठे है,बीहड़ की आँचल में
घूम रहे है,ख्वाबों की चादर में

कदम टेक दिये,शम्बर में
ज़िंदगी देख लिये,अम्बर में
व्योम की ओर हम भी कूद पड़े
कुदरत की दशा हम भी देख पड़े

सोये है,वसुन्धरा की सत्कार में
देख रहे है,मानव की अंहकार में
सूर्य की ज्योत,ज्ञान को बढ़ाती है
छिप जाने पर,हमें ही तो सुलाती है

आया हूँ हाथों को बाँधकर
देखा हूं ख्वाबों को लाँगकर
कब?-तक स्वयं को रोकूँगा
ज़िंदगी को कब?-तक  टोकूँगा

देखो,ये नयनों की बूँद नीर पर गिराते है
श्रावण आने पर,झूलों की तलाश कर लेते है
खुद को देखने लिए यादों में खोकर रह जाते है
ज़िंदगी को देखने के लिए ख्वाहिश में ही रह जाते है

रचयिता:रामअवध

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