कदम को आभार दूँ

*कविता*कदम को आभार दूँ

कदम को बाँधने हम चलते है
ज़िंदगी खंड गयी हम बोलते है
कभी कदम से ही बोल लेता हूँ
चलती पथ उसे ही देख लेता हूँ

कदम ही भू को नाप कर चलती है
चलती राहों में बार-बार डगमगाती है
ख्वाहिश की सज्जन मुझे तड़पाती है
वक्त की रेखा वक्त को ही बढ़ाती है

ठहर कर जाये उसे ज़िंदगी नही कहते
कहर कर आये उसे किल्ली नही कहते
ज़िंदगी को सुधार लूँ,वक्त को जाँच लूँ
खुद को परख लूँ,संसार को जकड़ लूँ

नयनों की झलक में खुद को उतार दूँ
कुदरत की पलक में खुद को उभार दूँ
ज़िंदगी के कदम में खुद को आभार दूँ
चाहत की तरफ में खुद को आधार दूँ

राहत की नजरिया ही तुझे दिखायेगी
मुलाक़ात की पथ ही तुझे समझायेगी
ज़िंदगी का पन्ना यूँ ही भरता-रहता है
समय का डगर यूँ ही चलता-रहता है

रचयिता:रामअवध


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