लुप्त में सुप्त

*कविता*लुप्त में सुप्त

डाह ही तनाव को भड़काती है
चाहत ही मानव को दौड़ाती है
दहन की साँसे चलती-रहती है
सहन की रातें ढलती-रहती है

लुप्त हो जायेगी,जानों की नगर
सुप्त हो आयेगी,शानों की डगर
मन की राह,इधर-उधर चलती है
तन की चाह,एकांत में ही बसती है

ज़िंदगी दूर से मेरी यादों को बुलाती है
दृष्टि के सामने ही झलक को ठहराती है
यादों की ज़िंदगी ही यादों को टहलती है
मुलाक़ात की राहों में ज़िंदगी रुलाती है

सुप्त हो जायेगी,ये ज़िंदगी की डगर
कभी ना नष्ट होगी,ये यादों की नगर
जीने की साँसे मुलाक़ात ही तो लाती है
मेरी ख्वाहिश मुझे रात ही तो दिखाती है

चलता-रहता है मेरी यादों का रक्त
ठहरता-रहता है मेरी यारों का वक्त
यादें की चाह ही हर बार रोकती है 
ज़िंदगी की राह ही हर बार टोकती है

रचयिता:रामअवध

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