अम्बुज की धारा

*कविता*अम्बुज की धारा

व्योस से निकली धारा
अब शीतल बनकर आयी है
कुदरत से निकली नारा
अब श्रावन बनकर आयी है

जोर-जोर से व्योम चिल्ला रहा है
तकलीफ़ का चरण मँडरा रहा है
कहर कर ये आसमान डहराती है
चमकती किरण भू पर गिराती है

अम्बुज भी अब रंग बदलेगा
धरती पर अब कहर बरसेगा
नीर की परख भू पर रह जायेगा
विभावरी बनकर गगन आ जायेगा

गगन भी कुछ बोलती है
अम्बुज के साथ रहती है
पवन के साथ लहरती है
कुदरत के साथ खेलती है

तुफानी हवा अब जागेगी
लहराते हुए अब जायेगी
कहर अपनी छोड़ जायेगी
वक्त अपनी मोड़ जायेगी

रचयिता:रामअवध

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