रमणी की वेदना

*कविता*रमणी की वेदना

आँचल से भरी लोहित थी
मानव की पीछे शोषित थी
नंगे कदम से चल रही थी
दंगे के दानव आ गयी थी

कष्ट लेकर वह चलती रही
विधाता के गुण गाती रही
दानव से खुद को बचाती रही
वनों की काया से छिपती रही

भूखे थे,शैतान का कपाल
देख रही थी,नक्त का काल
आ रहे थे,जिस्म पर प्रहार
रोक रही थी,दरिंदे का वार

अँधरियाँ रात छिपा लेती थी
रमणी का जिस्म बच लेती थी
कुदरत की चादर ओढ़ लेती थी
खुद की इज़्ज़त बचा लेती थी

हिम्मत से बनी उसके अंग थे
अँधेरे की पथ में उसके रंग थे
दरिंदो पर वह कहर जाती थी
पंरिदो  पर वह ठहर जाती थी

रचयिता:रामअवध





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