सोचता हूँ

*कविता*सोचता हूँ

कही बार,मैं सोचता हूँ
सोच कर,मैं लौटता हूँ
सुप्त में ही खो जाता हूँ
गुप्त में ही रह जाता हूँ

दशा की झलक रखता हूँ
आशा की पलक देखता हूँ
कष्ट की रेखा दिखती-बनती है
नष्ट की घना ढलती-बरसती है

उक्त से बनकर मेरी बात आयी है
वक्त को बुनकर मेरी रात ढाली है
जीने की झलक मेरी आज आयी है
नाद बनकर मेरी जिन्दगी सतायी है

झरनों की धारा ठहर गयी
बरसों की नारा बदल गयी
फूलों की सहारा लहर गयी
नीरों की बरसना बदल गयी

वक्त मेरा अब बदलकर रहेगा
जीने की दशा लहरकर बसेगा
घनों की चादर ओढ़ कर रहूँगा
राहों की नगर में चल बसूँगा

रचयिता:रामअवध

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