सृष्टि-दृष्टि

 

*कविता*सृष्टि-दृष्टि

व्योम से बरसता नीर मेरे तन को छू जाती है
बढ़ते नीर की धारा मेरे कदम को ले जाती है
गगन में चमकती उजाले की रात दे जाती है
सृष्टि को यूँ ही व्योम की धारा बहा ले जाती हैं

सृष्टि की यादों में मेरी दृष्टि हैं
दृष्टि की पलक में मेरी वृष्टि हैं
माटी पर मेरी चाहत आती है
कभी ना रहे,मेरी राहत रहती है

जगत की खेल में कुदरत रहती है
विधाता की शान में कुदरत बसती है
क्षण रखता हूँ,कुदरत की जान में
देख लेता हूँ,कुशलता की चादर में

लहरती है,मेरी जिंदगी दृष्टि पर
चाहती है,मेरी झलक सृष्टि पर
देखी रखी है,जग मैंने वृष्टि पर
चाहत बनी है,पग मेरी पृथ्वी पर

कही तो सृष्टि के साथ मेरी संगम होगी
वही की जिंदगी में मेरी भी संगीत होगी
कुदरत की जिंदगी मेरी ढल चुकी होगी
वही की यादों मेरी चाहत मर चुकी होगी

रचयिता:रामअवध



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