निर्जन

*कविता*निर्जन

दूरियाँ ही ज़िंदगी को बुलाती है
तन्हाई ही ज़िंदगी को भूलाती है
वक़्त को छोड़ देना,मेरी आदत है
दूर बसना ही,ज़िंदगी की इबादत है

 मन नही लगता,जीने के जमघट में
दूरियाँ टूट गयी,साँसे की मोहब्बत में
दूर की ज़िंदगी में मेरी ख़्वाब बसती है
निर्जन की आकांक्षा मेरी प्रेरणा बसती है
दूर रहने में ही,मेरी ख्वाहिश बरसती है

कदम की रोक,कही धूर पर रुकती है
कलम की नोक,कही हूर पर लिखती है
जीने की शोक,कही दूर पर लटकती है
दूर की मुलाक़ात,कहीनूर पर खिलती है

हट-हटकर रहना मेरी कामना बन गयी
मेरी ज़िंदगी ही मेरी मुलाक़ात बन गयी
दूरियाँ ही मेरी ख़्वाहिश बनकर आती है
चाहत का नजरियाँ,मेरी जान बनती है

दूरियों की डगर मुझे बुलाती है
चाहत की नगर मुझे सुलाती है
जीने की ज़िंदगी मेरी दिखाती है
बुलाने के लिए ही मुझे तड़पाती है

रचयिता:रामअवध

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