उत्कंठा

*कविता*उत्कंठा

 हर वक्त बिखर कर रहता हूँ
इच्छा को जागा कर रहता हूँ
खुद की सोच में डूबा रहता हूँ
वक्त की राहों में खिला रहता हूँ

चलते है डगर पर मिलते नही है
कदम पथ पर कभी ठिकते नही है
सोची ज़िंदगी कभी दिखती नही है
लिखी बातें कभी बिकती नही है

पर्ण की चमक दिखती-रहती है
वक्त के पन्ने में ढलती-रहती है
अंत वक्त में वह बिखर जाती है
तना की पकड़ से वह टूट जाती है
माटी की धूल पर वह गिर जाती है

दुनिया सब कुछ कह जाती है
राय की जड़ बो कर जाती है
हिम्मत को वह तोड़ कर जाती है
ज़िंदगी के दिल को छू कर जाती है

घबराती है मेरी ज़िंदगी भी
मोड़ जाती है मेरी आँखें भी
लोगों की बातें सुनकर रह जाता हूँ
दिल को ताम कर बस जाता हूँ

रचयिता:रामअवध




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