गाँव की पथ

*कविता*गाँव की पथ

कदम धीरे-धीरे चल रही है
मन गाँव की ओर बढ़ रही है
बचपन की याद में सो गयी है
गाँव की डगर मेरी रो गयी है

छोड़कर आ जाते है गाँव की पथ को
यादे सता देती है जिंदगी की नगर को
छोड़ देती है आँखे मेरी खुशियों बसेरा है
गाँव की यादे ही मेरी ज़िंदगी का सवेरा है

ओस की टपकती बूँदे उस क्षण याद आती है
ख्वाबों की बैठी रथ में उसकी अरमान आती है
ज़िंदगी की साँसे में गाँव की ख़्याल आती है
लड़प्पन की यादे में गाँव की बात आती है

 सुहाने पल का सुहाना इन्तजार है मुझे
कब?आऊँगा तेरे चरणों में बेकरार मुझे
ख्वाहिश रात मेरी खुशियों पर रख देना
जीने की चाहत मेरी गाँव पर बसा देना

रचयिता:रामअवध

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