धीरे-धीरे

*कविता*धीरे-धीरे

धीरे-धीरे ही वक्त का डगैरा ढलता है
बीत जाने पर लौट कर नही आता है
वक्त की छाप ही दोहराती व्यतीत को
शोभन ही दिखाती है,अंगो का रंग को

ज़िंदगी कुछ बोल कर ही दोहराती है
वादे को जोड़ कर,यादों आ जाती है
उजाला ही जागाती,वक्त ही दौड़ाती है
धीरे-धीरे वक्त की राह चलती-रहती है

हर बार अँधेरे की डगर मुझे भागाती है
जीने की वक्त मेरी कई बार सताती है
धीरे-धीरे ज़िंदगी भी सीखाती रहेगी
ख़्वाहिश की ख़्वाब भी बढ़ाती रहेगी

धीरे-धीरे,मैं भी व्यतीत में चला जाऊँगा
कसम से यादों में ठहर कर बस जाऊँगा
धीरे-धीरे ज़माने का अंग बढ़ता रहेगा
 डगर की छाप पर अंगार बढ़ता-रहेगा

धीरे-धीरे वक्त की यादे मिट जायेगा
कही हमारी पहचान भी लड़ जायेगा
धीरे-धीरे ये साँसो का अंग भी टूट जायेगा
धीरे-धीरे ये ज़माना का रंग भी ढल जायेगा

रचयिता:रामअवध






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