*कविता*सोये-सोये है

*कविता*सोये-सोये है

बिस्तर पर पड़े हम सो रहे थे
स्वप्न की चादर हम खो रहे थे
जगत की उक्त में हम रो रहे थे
ख्वाबों की छाया पर हम ही थे

नज़र की राज़ से बनती जगत देखूँगा
स्वप्न की बात से जागती रश्मि लिखूँगा
सोयो तन को वसुधा पर छोड़ कर आता हूँ
जागे मन को अर्श पर मोड़ कर आता हूँ

सोने की संसार हम भी बसेगें
ख़्वाब की राज़ हम भी रहेंगे
देखते है,विपत्ति कब? तक आयेगा
संकट का द्वार कब?तक बनायेगा

सीने का पीड़ा छिपा कर रखूँगा
आईने के सामने दिखा कर रहूँगा
रश्मि की नजरिया खुद ही बनाऊँगा
ख़्वाब की चाहत संसार पर लाऊँगा

देखते है,चाहत को कब?तक मिटायेगें
संकट का द्वार कब?तक लौट कर आयेंगे
बस कर रह जायेगें,हम,नसीब की तरह
संकट से लड़ लेंगे,हम लकीर की तरह

रचयिता:रामअवध








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