घिन की रथ

*कविता*घिन की रथ

 मेरी बात कही ना कही होती है
शाम होने से रात कही ढलती है
घृणा की अग्नि कही तो जलती है
मन की चाहत कही तो घटती है

जब मनुज पर वक्त की दशा छाती है
विनाश काल ही माथे पर मँडराती है
ज़िंदगी उसकी काल में नज़र आती है
वक्त का आईना उसी को दिखाती है

लोगों की ज़िंदगी ही दोहराता हूँ
बीते पल की राग उन्हें बताता हूँ
घृणा की पथ से दूर रहना चाहता हूँ
वक्त की अग्नि को ही रोकता हूँ

वक्त की आईना दिखाती है
लोगों की चाल भी बताती है
घिन की रथ उसी को भागाती है
जीने की चाहत उसी का घटाती है

घिन की पथ से दूर जाना चाहता हूँ
डगर में कही ओर खोना चाहता हूँ
ख्वाबों का नगर बसना चाहता हूँ
ज़िंदगी की पल मेरी आवाज़ देती है
घृणा की पल से मेरी आँख जलती है

रचयिता:रामअवध




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